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कौन है "शिव"? क्या है "शिव" होना? क्या है शिव तत्व?

शिव सरल हैं। शिव माधुर्य हैं। शिव भंडारी हैं।
शिव तपस्वी भी हैं और शिव ही विध्वंसकारी हैं।


रुद्राष्टाध्यायी के पांचवे अध्याय में भगवान शिव के अनेक रूप वर्णित हैं! रूद्र देवता को, सर्व पदार्थ रूप, सर्वजाति, मनुष्य, देव, पशु, वनस्पति के रूप मानकर, अंतर्यामी भाव एवं सर्वोत्तम भाव सिद्ध किया गया है इस भाव का ज्ञाता होकर ही साधक अद्वैतनिष्ठ बनता है।

शिव, त्रिदेवों में सर्वप्रिय व सर्ववंदनीय इसलिए हैं, क्योंकि वे एक सच्चे योगी हैं! जो विनम्र भी हैं, दयालु भी हैं और प्रभंजनकारी भी। इसलिए उन्हें आदियोगी, रुद्र और महाकाल भी कहा जाता है।

जहां एक ओर हमारे समाज को पुरुषवादी दंभ के विश्लेषणों से प्रसारित किया जाता है, हम इसके विपरित, शिव के नैसर्गिक गुणों के अवलोकन से सृष्टि को सराबोर करने वाली तथ्यों की ओर कभी आकृष्ट ही नहीं हो पाते हैं!! यदि हो पाते तो, हम शिव से, शिव को जानकर, स्वयं शिव हो सकते हैं

शिव इस सृष्टि के सबसे बड़े गृहस्थ हैं। अपने परिवार कि रक्षा के लिए शिव पूजा भी करते हैं, विलाप भी करते हैं और मृत्यु के सर पर नृत्य भी करते हैं।


शिव की प्रतिमा सर्वथा ध्यान की मुद्रा में होती है, जो इंगित करती है कि हमारे सभी समस्याओं के समाधान, सभी प्रश्नों के उत्तर और सभी कष्टों की मुक्ति, हमारे ही भीतर निहित है। ध्यान और योग के माध्यम से उसे जागृत करके, उसपर अंकुश करना ही "शिव" होना है।

शिव औघड़दानी भी हैं, अल्प पूजन विधि से भी प्रसन्न होकर अधिक देने वाले हैं। लठैत बैजू के नाम पर वैद्यनाथ धाम आज भी इसका प्रतीक चिन्ह है। इसका तात्पर्य है कि समस्त प्राणी के प्रति दयालु होना, और परोपकार का चरम भाव मन में धारण करना भी "शिव" होना है।

शिव व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। शिव सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति हैं। इसलिए जब उन्हें अपनी पत्नी का अर्धज्वलित शरीर मिलता है, तो पत्नी-प्रेम में विक्षिप्त हो कर तांडव भी करते हैं। अपनी सहजता को भूल कर त्रिशूल के खनक से सृष्टि को प्रलय में बदलने को आतुर हो जाते हैं। हमारे भीतर का पौरुष, शिव के पौरुष से प्रभावित है। जहां प्रश्न सत्य, न्याय और धर्म का हो, वहां काल के कपाल पर तांडव करने का साहस रखना ही "शिव" होना है।

जब समुद्रमंथन से अमृत और विष निकला तो समस्त देवों ने अमृतपान किया। परंतु जब विष पीने की बारी आई तो केवल महादेव आगे आएं, इसलिए वो नीलकंठ भी है। समाज के हितों को आत्मसात करने और उसके कष्टों को स्वयं पर लेना भी "शिव" है।

शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं, इसलिए वे "देवाधिदेव" हैं। आइए! इस महाशिवरात्रि पर हम अपने भीतर के शिवत्व को जागृत करें।



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