आप जानते हैं आकांक्षा दुबे और सुशांत सिंह राजपूत जैसे बड़े सितारे आत्महत्या क्यों करते हैं? ये है असली वजह..
मैं व्यक्तिगत रूप से Akanksha Dubey से बिलकुल भी प्रभावित नहीं था। मैंने कभी उन्हें सोशल मीडिया पर फॉलो भी नहीं किया, और नाही कभी YouTube या Google पर सर्च किया! हां, कुछ भोजपुरी गानों में उनके अदाकारी के कारण उन्हें जानता था।
परंतु आज की घटना से पूरी तरह स्तब्ध हूं। यह दुखद ही नहीं अपितु भयावह भी है। सवाल आकांक्षा दुबे की नहीं है, सवाल है की "हत्या" या "आत्महत्या"!! यदि इतने हाई प्रोफाइल लोगों की भोजपुरी इंडस्ट्री में या बॉलीवुड इंडस्ट्री में या किसी भी फील्ड में हत्या हो रही है तो प्रशासन को इसकी निष्पक्ष जांच करके दोषियों को दंडित करना चाहिए। क्योंकि जब इतने बड़े हस्ती सुरक्षित नहीं हैं तो आम इंसान पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
अब आते हैं दूसरे विषय पर.. यदि यह "आत्महत्या" है! तो निःसंदेह हम सभी को यह सोचने की आवश्यकता है की आखिर इतने नौजवान लोग आत्महत्या क्यों कर रहे हैं!!! आकांक्षा दुबे पहली कलाकार नहीं है, पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों से ना जाने कितने ही बड़े हस्तियों ने आत्महत्या किया है। वैसे लोग जिनके पास किसी भी प्रकार के सुख सुविधा की कमी नहीं थी, हर तरह का ऐश आराम था। फिर क्या कारण है कि युवापीढ़ी की मानसिकता इतनी खोखली होती जा रही है!!!
समस्या समाज की है और गंभीर है इसलिए इस पर बात होनी जरूरी है, इसलिए मैं कोई आंकड़ा नहीं दे रहा हूँ। लेकिन सच है कि छोटे छोटे गांवों, कस्बों और शहरों में हर दिन, ना जाने कितने ही युवा इसके शिकार होते हैं। बड़े बुद्धिजीवी लोग इसे डिप्रेशन का नाम दे देते हैं, लेकिन ये डिप्रेशन हो ही नहीं सकता, ये कुछ और ही है। मेरे रूम मेट्स अक्सर खुद को डिप्रेस्ड समझने लगते हैं, फिर उन्हें एहसास दिलाना होता है कि डिप्रेशन जैसी कोई चीज नहीं होती है। हम सभी को इसपर विचार करना चाहिए, एक ऐसे सकारात्मक माहौल का निर्माण करना चाहिए जहां युवाओं की मानसिकता हर परिस्थिति में सक्षम हो।
अरे हमारे देश में तो 23 वर्ष की उम्र में भगत सिंह देश के लिए फांसी चढ़ गए थे, क्या उन्हें तकलीफ नहीं हुई होगी? क्या सावरकर को यातनाएं नहीं सहनी पड़ी? लाखों ऐसे उदाहरण हैं यहां युवाशक्ति ने अपने घर परिवार को खोकर भी अपनी हिम्मत नही हारी और अपने हिस्से की जिंदगी जी। हमारे इसी समाज में, हमारे आस पास हजारों रेप पीड़िताएं अपनी इच्छाशक्ति को अपना आधार बनाकर, अपने हिस्से का जीवन जी रही हैं, फिर ऐसे सक्षम लोग.. और आत्महत्या.. हे राम!!
ऐसा विकास और ऐसा समाज हमारे किसी काम का नहीं जहां का नागरिक मानसिक रूप से खोखले हों। ऐसे "मोटिवेशनल स्पीकर्स" को भी देखना सुनना बंद करना चाहिए जो तथाकथित "डिप्रेशन" जैसे शब्दों का परिभाषा गढ़ कर उसे हमारे मन में बैठाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके झूठे प्रपंच में फंसकर और उससे डर कर ऐसे लोग आत्महत्या कर रहे हैं। हमारे–आपके जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान ना हो, और ऐसा कोई समाधान नहीं जिसे पाने की राह हमारे धार्मिक ग्रंथों में ना हो।
आंख बंद कीजिए और कहिए चूल्हे में जाए दुनियादारी और इसके सोकॉल्ड प्रोटोकॉल्स, और अपने जीवन को अपनी इच्छा से जिएं। मस्त रहिए, खुश रहिए, और समस्या हो तो मोटिवेशनल स्पीकर्स को नहीं, अपने धर्म को सुनिए.. सारा समाधान मिलेगा।
और यदि किसी बड़े ऑथर, फिलॉस्फर, साइंटिस्ट या स्पीकर का quote आत्मसात करना चाहें, तो कवि तुलसीदास का एक पंक्ति "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" आत्मसात कर लीजिए, आप कष्टों में भी मुस्कुराना सीख जाएंगे, मेरा वादा है। 😊
(मेरे मन में जो भाव था उसे मैंने दर्शाया है, कुछ त्रुटि हो इसमें तो बता कर सहयोग करें..🙏🏻)
#kavyaradhii #काव्याराधी #saynotosucide #sucideisnotsolution

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