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क्या साम्राज्यवादी थे राम ? आज भी इतने प्रभावशाली क्यूँ हैं राम ?

क्या आपने कभी सोचा है कि इतने युगों के बाद भी आज श्रीराम इतने प्रासंगिक क्यों हैं?

विश्व के इतिहास में राम एक मात्र महामानव हुए, जिन्होंने राजा होते हुए भी, अपनी राजगद्दी छोड़कर, वनवासी का जीवन व्यतीत किया। राम ईश्वर के अवतार थे या नहीं, यह आपके विवेक पर है, किंतु मानव के रूप में राम ने हर उस पीड़ा को सहा जो हमें या आपको होती है और उन पीड़ाओं को सहते हुए विश्व के लिए अपने जीवन से वह उदाहरण पेश किया, जो शायद कोई देवता भी नहीं कर पाए।

जहां अयोध्या के राजा दशरथ के दरबार में एक से एक विद्वान ऋषि का वास था, वहीं राम को बाल्यकाल में ही शिक्षा के लिए घर से दूर गुरुकुल में जाना पड़ा। जहां राजा जनक के दरबार में एक से एक वीर के विफल होने के बाद राम ने अपनी बाहु से शिव धनुष को तोड़ दिया, वहीं राम को अपनी अर्धांगिनी के हरण का असहाय दुःख भी भोगना पड़ा। जहां राम बाल्यावस्था में ही अपनी वीरता से ताड़का जैसी राक्षसी का वध किया, वहीं पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, राम को राजतिलक से ठीक पहले राज्य छोड़कर वनवास जाना पड़ा। जहां सबसे बड़े साम्राज्य के राजकुमार पूरे जीवन शांतचित्त रहे, राजगद्दी छोड़ने पर भी व्यथित नहीं हुए, वहीं लक्ष्मण के मूर्च्छा पर राम रोते रहे, बिलखते रहे। जहां बड़े-बड़े शूरवीर भी लंका की ओर जाने से डरते थे, वहीं समाज के वंचितों को इकट्ठा कर राम ने रावण का वध किया। जब इतिहास राजा को उनकी वीरता और साम्राज्यवाद के लिए याद रखता है, वहीं राम ने जीती हुई सोने की लंका पर विभीषण का राजतिलक किया। इतने कष्ट और जीवन के उतार-चढ़ाव के पश्चात भी, राम अपने धर्म और कर्तव्य से विचलित नहीं हुए, अधीर नहीं हुए, और 14 वर्ष के वनवास के बाद जब राजा बने, तो ऐसा शासन किया कि दुनिया आज भी 'रामराज्य' का उदाहरण पेश करती है।

जब ब्रह्मा जी को अपने पांच शीश पर सर्वशक्तिमान होने का अभिमान हुआ, तो उनसे एक शीश वापस ले लिया गया। जब भगवान विष्णु के अंदर क्षल का वास हुआ, तब समुद्र मंथन से निकली लक्ष्मी को अपने पर मोहित कर उनसे विवाह कर लिया। जब महादेव शिव का सती से वियोग हुआ था, तब शिव कई वर्षों तक घोर अवसाद में चले गए थे। जब दुर्योधन ने भरी सभा में कृष्ण का अपमान किया, तो श्रीकृष्ण ने पूरे कुरुकुल का नाश कर दिया। लेकिन इसके ठीक उलट, राम के जीवन में सुख के अतिरिक्त सब कुछ था, फिर भी वे कभी अवसाद में नहीं गए। उन्होंने कभी विधि पर या विधान पर आपत्ति नहीं उठाई, किसी से कुछ याचना नहीं की, अपितु अपने स्वाभिमान पर अडिग रहे, और हर प्रतिकूल परिस्थिति में धर्म का पालन करते रहे। शायद इसलिए वे 'राम' हैं।

¶ वनवासियों/वंचितों के राम– राम ने अपने पिता से मिले इस वनवास को किसी अभिशाप की तरह नहीं, बल्कि एक वरदान के रूप में स्वीकार किया। इसलिए यशस्वी और राजस्वी होने के बाद भी राम अपने वनवास के काल में किसी राजा या सामंत के पास नहीं गए। वे अपना पूरा वनवास, एक कुटी में रहकर और जंगल से मिलने वाले कंद-मूल खाकर समय बिताते रहे। उन्होंने केवट मल्लाह को गले लगाकर, उसे अपना मित्र बनाया। राम पूरे वनवास के रास्ते में किसी सेठ या जमींदार के यहां नहीं गए, बल्कि साधु-संतों के आश्रम में और वनवासियों के बीच गए, उनसे संगति कर उन्हें अपना बनाए। जब राम के सामने बाली और सुग्रीव की परिस्थिति आई, तब राम ने राजा बाली का नहीं, बल्कि राजसत्ता से 'उपेक्षित' और 'वंचित' सुग्रीव का साथ दिया और बाली का वध कर सुग्रीव का राजतिलक किया।

¶ धीरोदात्त नायक राम – राम आदर्श, धीरोदात्त नायक हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, उनके अंदर सागर जैसी गंभीरता है और उनके चरित्र में पहाड़ सदृश ऊँचाई है। वाल्मीकि रामायण श्री राम को परमपुरुष और धीरोदात्त नायक के रूप में प्रस्तुत करती है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, इसलिए अनुकरणीय हैं, किंतु स्वयं भगवान नहीं हैं। राम में नैतिकता का प्रबल प्रवाह है। राम अपने जीवन की सबसे प्रिय, अपनी अर्धांगिनी के हरण और अपने प्रिय भाई लक्ष्मण की मूर्च्छा जैसी विकट परिस्थिति में भी अधीर नहीं होते। अपने से अधिक बलशाली बाली और रावण का वध करने के बाद भी अहंकारी नहीं होते। यही कारण है कि श्रीराम के संपर्क में जो भी आया, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका, चाहे वह योद्धा हो या सामान्य व्यक्ति, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, ऋषि, संत या महात्मा हो।

¶ कुशल संगठनकर्ता राम – राम अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान समाज के पिछड़ों और वंचितों को एकत्रित करते रहे। जब सिया हरण के बाद रावण से युद्ध का समय आया, तो राम ने किसी बड़े राजा या सामंत का पैरोकार नहीं किया, बल्कि सभी वंचितों को एक साथ बुलाकर उनमें लड़ने की साहस भरी। राम कभी भी स्वयं से संपूर्ण निर्णय नहीं लेते थे। अपितु हर निर्णय से पूर्व अपने सभी सहयोगियों से परामर्श लेते, तत्पश्चात उनके एकमत होने पर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचते थे। वनवासी होने के दौरान भी राम एक लोकप्रिय और प्रभावशाली राजा की भांति सबको साथ लेकर चलते रहे।

जब श्रीराम की सेना लंका पहुंचती है, तब सारी रणनीति पूर्ण होने के बाद भी, युद्ध प्रारंभ करने से पूर्व राम अंतिम व्यक्ति तक की इच्छा पूछते हैं। बाबा तुलसी ने इस संदर्भ में लिखा है– "इहाँ प्रात जागे रघुराई, पूछा मत सब सचिव बोलाई, कहहु बेगि का करिअ उपाई॥" अर्थात, युद्ध के दिन भी प्रातः उठकर राम अपने सचिवों को बुलाकर उनका परामर्श लेते हैं कि क्या उपाय करना चाहिए!! इससे यह स्पष्ट होता है कि अंतिम क्षणों तक भी उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व अपने सचिवों के साथ विचार किया।


¶ राम की उदार नेतृत्व क्षमता – हम जब भी अपने जीवन के बड़े हिस्से में सफल होते हैं, तो उसका सारा श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं। समय-समय पर हमारा साथ देने वाले छोटे सहयोगियों को हम उस सफलता का पात्र नहीं मानते। लेकिन युद्ध के पश्चात राम अपने विजय का श्रेय स्वयं नहीं लेते। राम एक-एक कर अपने सभी सहयोगियों को विजय का श्रेय देते हैं। यहां तक कि रावण के भाई विभीषण से राम कहते हैं "त्वत् प्रभावां, मयः जीतं" अर्थात् तुम्हारे प्रभाव से मेरी जीत हुई।

महान नेता वही है, जो अपने से छोटे सहयोगियों को भी महानता प्रदान करें, और स्वयं श्रेय का धारण न करें। श्री राम, रावण पर हुई अपनी विजय का श्रेय कभी हनुमान को देते, कभी लक्ष्मण को, कभी सुग्रीव, नल-नील को तो कभी अंगद या विभीषण को देते। राम ने अपनी सेना में किसी को कमजोर नहीं समझा, और किसी को कभी असहाय भी नहीं छोड़ा। अपने घायल सैनिकों की राम ने स्वयं सेवा की। जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे, तब पहली बार राम अपने युद्ध के निर्णय पर पश्चाताप कर रहे थे, किंतु उस समय भी उन्होंने सारा दोष स्वयं पर लिया और अपने सहयोगियों को युद्ध से पीछे हटने के लिए कह दिया, ऐसी थी राम की उदार नेतृत्व क्षमता।

¶ क्या साम्राज्यवादी थे राम? — राम के ऊपर विधर्मी सदैव एक सवाल उठाते हैं कि क्या राम साम्राज्यवादी थे! हमारे राम समर्थ होने के पश्चात भी कभी साम्राज्यवादी नहीं हुए। उन्होंने कभी राज्य की सीमाओं के लिए युद्ध नहीं किया। अयोध्या से निर्वासित होने के बाद, वनवास के क्रम में वे किष्किंधा और लंका जैसे दो बड़े राज्यों को जीतकर, सुग्रीव और विभीषण को दे दिया। अपने चरम युद्ध में भी राम ने अपनी जीती हुई किष्किंधा से आंशिक सहयोग लेने से इंकार करते रहे। राम ने अपने पूरे जीवन में कभी अपने सीमावर्ती राज्यों से युद्ध नहीं किया। यह दर्शाता है कि राम साम्राज्यवादी नहीं, अपितु मर्यादित और स्वाभिमानी थे।

¶ प्रजाप्रिय राम– जब रावण का वध करके राम अपनी अयोध्या में वापस लौटते हैं, तब पूरे अयोध्यावासी उनके स्वागत में घी के दिए जलाते हैं। आज हम सभी जिस "राम–राज्य" की कल्पना करते हैं, राम ने अयोध्या में वैसा शासन किया। राम के राज्य में प्रशासन प्रणाली सुलभ और पारदर्शी थी। राम न्यायप्रिय, धर्मप्रिय, कर्तव्यनिष्ठ और दयालु थे। राम के राज्य में प्रजा दैहिक, दैविक और भौतिक तापों के भय से मुक्त थी। सर्वजन स्वस्थ, बुद्धिमान, साक्षर, गुणज्ञ, ज्ञानी, नैतिक तथा कृतज्ञ थे। इसलिए रामराज्य की स्थापना, आदर्शवादी राज्य की कल्पना है।

हमें यह भी समझना होगा कि राम का युद्ध केवल राम का नहीं है! राम का युद्ध केवल एक व्यक्ति से या रावण से नहीं है! यह युद्ध स्वयं में कई समाधानों का प्रतीक-युद्ध है। अपितु यह युद्ध हर काल का शाश्वत नियम है। श्री राम द्वारा इस युद्ध के नाम पर प्रत्येक व्यक्ति को एकत्रित कर अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा कर दिया गया। यह एक विलक्षण उदाहरण है जो हर काल, हर युग में घटित होता है।

इसमें एक सर्वकालिक सामाजिक नियम यह परिलक्षित होता है कि उस समय भी बड़े बुद्धिजीवी राम के पक्ष में प्रत्यक्ष नहीं दिखते। वे संतुलन बनाने के प्रयास में अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। बड़े विद्वान अक्सर दुविधा में रहते हैं और अपना मत तब प्रकट करते हैं जब जीतने वाले का पक्ष स्पष्ट हो जाता है।

राम और रावण के युद्ध में भी देव–गंधर्व इसी दुविधा में थे। वे जानते थे कि एक तरफ रावण है जो कभी हारा नहीं! और दूसरी तरफ स्वयं श्री राम, वंचितों और वानरों की सेना लिए सीमित संसाधनों के साथ युद्धभूमि में नंगे पांव खड़े हैं। युद्ध किसी भी निर्णय पर जा सकता था, इसी कारण देवता असमंजस में थे कि किसका पक्ष लिया जाए!!

जब राम–रावण का युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंचा, और राम की विजय सुनिश्चित होने लगी, तब देवों ने राम के पक्ष लेने का निर्णय लिया। जिसमें इंद्र ने अपना रथ राम के पास भेजा। राम को रथ की आवश्यकता युद्ध के प्रारंभ से ही थी, किंतु इंद्र अवसर की प्रतीक्षा में रुके रहे और धर्म से विचलित हो गए।

समाज में ऐसे लोगों की कमी तब भी नहीं थी, आज भी नहीं है जो समय की प्रतीक्षा करते हैं, और जीतने वाले के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। राम का जीवन हमें हर परिस्थिति में धर्म के साथ खड़े रहने और धर्म के लिए लड़ने का संदेश देता है।

राम साक्षात अवतार होते हुए भी अपने जीवन में कभी चमत्कार नहीं दिखाते हैं, विद्वान होते हुए भी कहीं अपनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं करते हैं। राम सहज हैं, राम सरल हैं, राम धैर्यवान हैं, इसलिए राम आज भी प्रासंगिक हैं और मानवता के आदर्श हैं।

राम कोई देव नहीं हैं, अपितु वे मानव के देह में देवत्व का बोध हैं। राम का देवत्व बोध ही 'रामत्व' है। असफलता का अपयश स्वयं पर लेना, और सफलता का यश अपने सहयोगियों को देना, ये 'रामत्व' है। दूसरों के गुणों की प्रशंसा करना, और उनके दुर्गुणों का, बिना किसी से कहे उपचार करना, ये 'रामत्व' है। राम अपने समक्ष रावण को भी श्रेष्ठ मानते हैं, ये उनका 'रामत्व' है। हमारे सामान्य विकारों से पार पा जाना ही "रामत्व" है। 'रामत्व' का तात्पर्य है शून्यता से ब्रह्मांड का निर्माण। हम भाग्यशाली जनसमूह हैं जो उनके अनुचर हैं। आइए! हम भी अपने भीतर के 'रामत्व' का आह्वान करें।

© काव्याराधी ✍🏻
Email: kavyaradhi@yahoo.com


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