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वो किरदार नही हम - © काव्याराधी


मत लड़ मुझ से ए ज़िन्दगी अब वो किरदार नहीं हम ,
तुझे जीतने चले थे कभी! अब तेरे हकदार नहीं हम।।

कभी आंख चुराई थी हमने...कभी धूल झोंका था तुझ पर , 
कभी हट कर बैठे तुझसे...कभी मसखरी थोपा था तुझ पर! 
कभी फटे किताबों के पन्नों में - कभी स्कूल वाली बेंचो पे.. 
कभी धूल भर सड़कों पे - कभी खेल गली वाले कंचो में..
हर बार मात दी है तुुझे... हर बार बाज़ी थी हमारी... 
बचपन था तब निश्छल थे! अब वो किरदार नहीं हम...
मत लड़ मुझ से ए ज़िन्दगी - अब तेरे हकदार नहीं हम।।

राज दुलारे बन बैठे - जब तूने पीठ थपथपाई थी ,
जब हर गलती पर छोटा कह, मेरी मान बचाई थी।
तेरा साथ पाकर हमने , कितनों के शीशे तोड़े हैं...
कितनी शोर मचाई है!! कितनों पे दम छोड़े हैं...!! 
तू संग थी तो हर बाज़ी - हर तराना अपना था!
तेरे होने के भरोसे से ; यह जमाना अपना था!!

कोई पीठ पर नहीं मेरे, अब किसी के सरताज नहीं हम ;
मत लड़ मुझसे ए ज़िन्दगी ; अब तेरे हकदार नहीं हम।।

याद है! जब तूने रेत पर घर का सपना दिखलाया था...
अरे! तूने ही तो पेड़ पर सितारे बांधना सिखलाया था...
वो कुछ ख्वाहिशें जो तूने अपने साथ सजवायी थी ;
वो कुछ बंदिशे जो तूने ही अपनों से बंधवाई थी.....
"कुछ करो अच्छा" कहा था तूने ही अर्थ जीवन का!!
पर कभी बतलाया नहीं तूने कठिन राह जीवन का..!!

अब मखमली चादर नहीं रहे - वो वक्त पुराने चले गए ;
तेरी चुनौतीयों में हमारे - दिन के निवाले चले गए...
तेरी ख़ुशी पूरी करने चले , तूने ही छोड़ा तन्हाई में..
हम लड़े भी तो कैसे तुझसे खुद अपनी परछाई में??

बिखड़े हैं हालात से अपने ; राह दिखा सके वो तार नहीं..
ना तुम हो संग मेरे - साथ बचपन वाले वो यार नहीं...
ख्यालों में खोये हैं काव्यराधी - तेरे तो दावेदार नहीं हम...
मत लड़ मुझ से ए ज़िन्दगी... अब वो किरदार नहीं हम।
तुझे जीतने चले थे कभी - अब तेरे ही हकदार नहीं हम।।

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