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भारत का गौरवशाली दिवस: "वीर बाल दिवस"


भारत आज पहली बार 'वीर बाल दिवस' मना रहा है। एक ऐसा दिन जब मजहबी उन्माद में बौराए लोगों का संघर्ष करते हुए, गुरु गोबिंद सिंह जी के चार साहिबजादों ने अपनी आहुति दे दी। हमारे देश का यह दुर्भाग्य रहा है कि इतनी बड़ी पुण्यवेदी के इतिहास का अध्ययन ना कर सका।

पौराणिक युग से लेकर आधुनिक काल तक, वीर बालक-बालिकाएं भारत की परंपरा का प्रतिबिंब रहे हैं। 'शहीदी सप्ताह' और 'वीर बाल दिवस' निस्संदेह भावनाओं से जुड़े हुए हैं, लेकिन ये निश्चित रूप से अंतहीन प्रेरणा भी लेकर चलते हैं।

इतिहास से लेकर किंवदंतियों तक, हर क्रूर चेहरे के सामने भारतीय महानायकों और महानायिकाओं के भी एक से एक महान चरित्र रहे हैं। लेकिन चमकौर और सरहिंद के युद्ध में जो कुछ हुआ, वो ‘भूतो न भविष्यति' था।

एक ओर धार्मिक कट्टरता में अंधी इतनी बड़ी मुगल सल्तनत, दूसरी ओर, ज्ञान और तपस्या में तपे हुए हमारे गुरु, भारत के प्राचीन मानवीय मूल्यों को जीने वाली परंपरा! यह बात बहुत पुरानी नहीं है! केवल 3 शताब्दी पहले हमारी भूमि पर यह घटित हुआ था। लेकिन अतीत इतना भी पुराना नहीं है कि इसे भुला दिया जाए। 

अगर हमें भारत को भविष्य में सफलता के शिखरों तक लेकर जाना है, तो हमें अतीत के संकुचित नजरियों से भी आज़ाद होना होगा। इसलिए, आजादी के 'अमृतकाल' में देश ने 'गुलामी की मानसिकता से मुक्ति' का प्राण फूंका है।

उस दौर की कल्पना करिए! जहां एक ओर आतंक की पराकाष्ठा थी, तो दूसरी ओर आध्यात्म का शीर्ष! एक ओर मजहबी उन्माद था, तो दूसरी ओर सबमें ईश्वर देखने वाली उदारता थी! इस सबके बीच, एक ओर लाखों की फौज थी, तो वहीं दूसरी ओर अकेले होकर भी पहाड़ की भांति निडर खड़े गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके वीर साहिबजादे!

बाबा जोरावर सिंह साहब और बाबा फतेह सिंह साहब जैसे कम उम्र के बालकों से, आखिर औरंगजेब और उसकी सल्तनत की क्या दुश्मनी हो सकती थी? दो निर्दोष बालकों को दीवार में जिंदा चुनवाने जैसी दरिंदगी क्यों की गई? केवल इसलिए, क्योंकि औरंगजेब और उसके लोग गुरु गोविंद सिंह के बच्चों का धर्म तलवार के दम पर बदलना चाहते थे।

लेकिन, भारत के वो वीर पुत्र, वो वीर बालक, मौत से भी नहीं घबराए। मुगलिया सल्तनत के आगे झुके नहीं, अपनी हिम्मत जुटाकर डटे रहें। वो दीवार में जिंदा चुन गए, लेकिन उन्होंने उन आततायी मंसूबों को हमेशा के लिए दफन कर दिया।


साहिबजादों ने राष्ट्र-धर्म के लिए इतना बड़ा बलिदान और त्याग किया, अपना जीवन न्यौछावर कर दिया, लेकिन इतिहास की धोखाधड़ी में इतनी बड़ी 'शौर्यगाथा' को भुला दिया गया।

लेकिन अब 'नया भारत' दशकों पहले हुई अपनी पुरानी भूल को सुधार रहा है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें बाल राम के 'ज्ञान' से लेकर उनके 'शौर्य' तक, गुरु वशिष्ठ के आश्रम से लेकर गुरु विश्वामित्र के आश्रम तक के मूल्यों और सिद्धांतों को संजो कर रखने का कर्तव्य मिला है।

हम आजादी के 'अमृत महोत्सव' में देश के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वाधीनता सेनानियों, वीरांगनाओं, आदिवासी समाज के योगदान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हम काम कर रहे हैं।

इसी क्रम में, सिख गुरु परंपरा केवल आस्था और अध्यात्म की परंपरा नहीं है। ये 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' के विचार का प्रेरणा पुंज भी है। हमें साथ मिलकर '#वीर_बाल_दिवस' के संदेश को देश के कोने-कोने में लेकर जाना है। 'वीर बाल दिवस' हमें याद दिलाएगा कि दश गुरुओं का योगदान क्या है!! देश के स्वाभिमान के लिए सिख परंपरा का बलिदान क्या है!! 'वीर बाल दिवस' हमें ज्ञात कराएगा की भारत क्या है, भारत की पहचान क्या है!!

हमारे साहिबजादों का जीवन-संदेश देश के हर बच्चे तक पहुंचे, वो उनसे प्रेरणा लेकर देश के समर्पित नागरिक बनें... हमें इसके लिए प्रयास करने हैं। उन साहिबजादों को हमारा कृतज्ञ राष्ट्र नमन करता है।


(माननीय प्रधानमंत्री जी के उद्बोधन से संकलित) 

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