शायरी - मुक्तक
तुझ पर मेरे इश्क़ का बुखार जबरदस्त है..
प्रिय तुम्हारा स्नेह! ज्यों चाँद किसी पूर्णिमा सा..
तव्वको में अभिसार है कोई प्रियवर चकोर सा..
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एकतरफा है इश्क़ मेरा! इसमें कोई क्या इजाफ् करें?
सुनो! तुम अगर इशारा करो! तो हम भी इजहार करें..
तेरी आबरू है माथे मेरी! इससे है कुछ नायाब क्या?
जरा निगाहें सरका लो तुम! हम सै बरस इंतजार करें..
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तेरी आँखों के काजल से उतरी जो नजरें..
जमाने भर की उल्फत से बिखर गए हम!!
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क्या खूब किस्मत पायी है पीतल के टुकड़ो न!
हमसे भी ज्यादा करीब है हमारी मोहब्बत के।
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ठोकर खा कर भी खुद संभलना पड़ता है।
कितनी पलकें भींगी हैं ये बतलायें किसे हम!
अपनी उलझन की बातें, समझाएं किसे हम?
उम्मीद भरी जिम्मेदारियों के पतवार हैं हम लड़के।
महकती वसुंधरा के हसरती श्रृंगार हैं हम लड़के॥
किस बेताबी से तेरी ओर निहारता है रहबर..
मगरूर तुझे इस तलख कि खबर तक नहीं!!
प्रातः होड़ के कोलाहल में, वांछित सी तुम शांति हो,
मैं मकर सा पर्व अधूरा, तुम पूर्ण करती संक्रांति हो।।
थामे रहो तुम - डोर मेरे जीवन का इस कदर,
उड़ता फिरूँ मैं आसमां में पतंग जैसे बेफ़िकर।
© 2022 (All rights are reserved.) काव्याराधी ~ kavyaradhi






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