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शायरी - मुक्तक


 तेरी लड़खड़ाती जुबाँ बयां कर रही थी..

तुझ पर मेरे इश्क़ का बुखार जबरदस्त है..

© काव्याराधी

प्रिय तुम्हारा स्नेह! ज्यों चाँद किसी पूर्णिमा सा.. 

तव्वको में अभिसार है कोई प्रियवर चकोर सा.. 

© काव्याराधी

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एकतरफा है इश्क़ मेरा! इसमें कोई क्या इजाफ् करें?

सुनो! तुम अगर इशारा करो! तो हम भी इजहार करें..

तेरी आबरू है माथे मेरी! इससे है कुछ नायाब क्या?

जरा निगाहें सरका लो तुम! हम सै बरस इंतजार करें..

© काव्याराधी

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तेरी आँखों के काजल से उतरी जो नजरें..

जमाने भर की उल्फत से बिखर गए हम!!

© काव्याराधी

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क्या खूब किस्मत पायी है पीतल के टुकड़ो न!

हमसे भी ज्यादा करीब है हमारी मोहब्बत के।

© काव्याराधी

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छोटी सी उम्र में हमें सब सहना पड़ता है..
ठोकर खा कर भी खुद संभलना पड़ता है।

कितनी पलकें भींगी हैं ये बतलायें किसे हम!
अपनी उलझन की बातें, समझाएं किसे हम?

उम्मीद भरी जिम्मेदारियों के पतवार हैं हम लड़के। 
महकती वसुंधरा के हसरती श्रृंगार हैं हम लड़के॥

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किस बेताबी से तेरी ओर निहारता है रहबर..

मगरूर तुझे इस तलख कि खबर तक नहीं!!


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जरा देखो इन गुलाबी पंखुड़ियों के बेबसी को..
कितने बेताब है नादान तुमसे छुए भर जाने को..

राह चलते मुक्कमल काँटों से भी इश्क़ करो जाना, 
गुलाब फ़ितरतन ना आया करते गुलाब बचाने को..


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प्रातः होड़ के कोलाहल में, वांछित सी तुम शांति हो,

मैं मकर सा पर्व अधूरा, तुम पूर्ण करती संक्रांति हो।।


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थामे रहो तुम - डोर मेरे जीवन का इस कदर, 

उड़ता फिरूँ मैं आसमां में पतंग जैसे बेफ़िकर।


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© 2022 (All rights are reserved.) काव्याराधी ~ kavyaradhi


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