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एक स्वयंसेवक ~ © काव्याराधी


राष्ट्र मंगलाहुति में अपनी गणना चाहता हूँ।
मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥

एक संकल्प अब करना है ढीठ,
हो विश्व कुंठित पर समाज गठित। 
कंट-विषैल राहों से हो कर हम,
करें , संघ शक्ति युग संगठित॥

परहित स्वप्न में स्व-अर्पण चाहता हूँ। 
मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥

अनुशासन का स्मृद्ध संस्कार,
लेता देखो यूँ हममें आकार। 
भाषा व्यवहार से हर्षित मन अपार,
दुर्व्यवहार से दूर हो रहा स्वप्न साकार॥

हिन्दू समाज का मंथन करना चाहता हूँ। 
हाँ! मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥

नवचेतन की ऐसी भव्य शक्ति,
प्राणों से भी उर्ध्व मातृ भक्ति। 
जात-पात सब भूल भूलाकर जहां,  
मन हिन्दुत्व की है इक पहचान प्रती॥

क्लिष्ठ तपस्या में संघ कि, जलना चाहता हूँ।
हाँ! मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥

माँ भारती कि आन हैं हम,
हिन्दुत्व कि पहचान हैं हम। 
विवेका शिवा महाराणा चौहान, 
वीर भगत सिंह के नाम हैं हम॥

शौर्य भगवा की परम गाथा को, 
जन-जन ह्रदय से तरना चाहता हूँ। 
हाँ! मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥ 
हाँ! मैं एक स्वयंसेवक बनना चाहता हूँ॥

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