स्क्रीन पर अधिक समय देना संपूर्ण शारीरिक विकास के लिए सबसे बड़ी समस्या.. जानिए कैसे!!
आज के दौर में विद्युत उपकरण हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गई हैं. बच्चों से लेकर युवा पीढ़ी तक स्वयं को व्यस्त रखने के लिए टी.वी. स्क्रीन, मोबाइल अथवा लैपटॉप का अधिक उपयोग करते हैं। या फिर अक्सर पैरेंट्स भी अपने व्यस्तता के कारण बच्चों को टीवी के सामने बैठा देते हैं। ऐसे में कई बार माता-पिता इस बात का भी ध्यान नहीं देते है कि उनका बच्चा क्या देख रहा है और कितनी देर से स्क्रीन के सामने है।
खासकर शहरी जीवन शैली में बच्चों का खेल-कूद, भाग-दौड़ जैसी फिजिकल गतिविधि कम होती जा रही है। स्क्रीन टाइमिंग से अनजान बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय घर की चाहरदिवारी के अंदर इलैक्ट्रोनिक गैजेट्स के साथ बिता रहे हैं। जिसका दुष्प्रभाव कुछ समय अंतराल पर ही दिखने लगता है।
स्क्रीन टाइम का बच्चों पर होने वाले असर को लेकर गुड़गांव के "फोर्टिस अस्पताल" में नेत्र विज्ञान विभाग की डायरेक्टर डॉ. अनीता ने बताया है कि "आजकल ज्यादातर पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए एंटी ग्लेयर चश्मे और आंखों की परेशानियों को लेकर सलाह लेने आते रहते हैं। जाँच के दौरान पता चलता है कि स्क्रीन पर अधिक समय देने के कारण स्क्रीन से निकलने वाली हानिकारक किरणें सीधा उनके पुतलियों को प्रभावित कर रही है।"
ऐसे परेशानी से बचने के लिए स्क्रीन टाइम कम करना एक बेहतर उपाय है। ज़्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों में शारीरिक एवं मानसिक तनाव भी उत्पन्न होता है। इसके साथ ही उनके सोचने और याद रखने कि शक्ति कम होती है और संपूर्ण शारीरिक विकास भी अवरुद्ध होती है।
क्या होता है स्क्रीन टाइम?
"स्क्रीन टाइम का अर्थ है प्रति दिन मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और टैबलेट जैसे गैज़ेट के इस्तेमाल में दिया जाने वाला समय.."
"अमेरिकन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स" ने बच्चों के स्क्रीन टाइम के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके अनुसार -
• 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखा जाए।
• 18 से 24 महीने के बच्चों को माता-पिता उच्च गुणवत्ता वाले स्क्रीन्स कुछ ही समय के लिए दिखाएं।
• 2 से 5 वर्ष तक के बच्चे एक घंटे से ज़्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल ना करें।
• छह साल और उससे ज़्यादा उम्र के बच्चों के स्क्रीन देखने का समय सीमित हो।
• सुनिश्चित करें कि बच्चे के पास सोने के लिए, खेल कूद एवं अन्य फिजिकल एक्टिविटी सहित ज़रूरी कामों के लिए पर्याप्त समय हो।
एवं इत्यादि..
लेकिन फिलहाल स्थितियां अलग हैं. बच्चे क्लास के अलावा असाइनमेंट, रिसर्च और मनोरंजन के लिए भी मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं। इससे उनका स्क्रीन टाइम कहीं और ज़्यादा बढ़ गया है।
इसके साथ ही हम पाते हैं कि बच्चों के ऑनलाइन क्लासेज़ होने से मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बढ़ गया है, और बच्चे स्क्रीन पर ज़्यादा वक़्त बिताने लगे हैं। इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। ऑनलाईन क्लासेज् आने के बाद बच्चों के बीच फिज़िकल एक्टिविटी और ज्यादा कम गयी है।
स्क्रीन पर उनके व्यस्तता से होने वाले खतरे को समझते हुए सरकार ने भी इंटरनेट के इस्तेमाल से जुड़ी कुछ आवश्यक सलाह एवं दिशा निर्देश जारी किया है। साथ ही माता-पिता के लिए इन नई स्थितियों में सामंजस्य बैठाने के तरीक़े भी सुझाए हैं।
मानव विकास संसाधन मंत्रालय ने बच्चों पर डिज़िटल पढ़ाई से हो रहे शारीरिक और मानसिक प्रभावों को देखते हुए “प्रज्ञाता” नाम से डिजिटल शिक्षा संबंधित दिशानिर्देश ज़ारी किया है।
• इसमें ऑनलाइन क्लासेज़ की संख्या और समय को सीमित करने के लिए सुझाव दिए गए हैं।
• इसमें समय-समय पर ब्रेक लेने, ऑफलाइन खेल खेलने और माता-पिता की निगरानी में क्लास लेने की सलाह दी गई है।
• बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ने को लेकर पहले से चिंता जाहिर की जाती रही है, इसलिए टाइमिंग सही करने का सलाह भी दिया गया है।
• साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाए कि स्क्रीन कि दूरी आँखों से जितना अधिक और सुलभ हो सके उतना बेहतर है।
• स्क्रीन का उपयोग करते समय कभी भी लगातार स्क्रीन पर ना देखें, हो सके तो आस पास नज़र घुमाते रहें।
अब तक लोगों का सिर्फ ये मानना था कि स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से आंखें खराब होती हैं! लेकिन डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसका परिणाम और भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। 5 साल से कम उम्र के बच्चों का निर्धारित समय से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके शारिरिक और मानसिक विकास को अवरुद्ध कर देता है। रात को लंबे समय तक मोबाइल चलाने से व्यस्कों में "मेलाटोनिन" नामक हार्मोन का लेवल कम हो जाता है, जिसकी वजह से स्ट्रेस लेवल बढ़ जाता है। इस रिपोर्ट के जरिए WHO ने माता-पिता या अभिभावक को बच्चों को मोबाइल फोन, टीवी स्क्रीन, लैपटॉप और अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रखने की हिदायत दी है।


Post a Comment