Ads

आपातकाल से लोकतंत्र तक : संघर्ष आंदोलन की।


 आज का दिन भारत के स्वर्णिम इतिहास में एक ऐसा स्याह धब्बा है जिसकी इसकी गंध कभी नहीं मिटने वाली..
 
सत्ता के उन्माद में मगरूर एक ऐसे भी प्रधानमंत्री को इस देश ने झेला है ; जिनका कार्यकाल मासूम जनता व बेगुनाह छात्रों के खून से पूर्ण हुआ है। एक ऐसी प्रधानमंत्री जिसे अपने विरुद्ध एक शब्द भी सुनना जैसे विष की घूँट लगती थी ; पूरे राष्ट्र को विष के तालाब में परिवर्तित कर दिया। संसद में पूर्ण बहुमत और विपक्ष न होने के कारण स्वयंभू इंदिरा ने महामहिम राष्ट्रपति तक की शक्ति कम करके उन्हें मुदर्शक बना दिया।

1975 का यह वो दौर था जब नेशनल कांग्रेस पार्टी भारत का एकमात्र सत्ता भोगी के रूप में स्थापित था। एक ऐसा शासन जिसमें विपक्ष की भूमिका शून्य थी। 1971 के युद्ध के बाद अहंकार का दूसरा नाम बन चुकी थी इंदिरा गांधी। वक्त था जब उनके कुछ गलत नीतियों का विरोध भारत के आम नागरिक , सामाजिक नेता , राजनेता व छात्रों ने करना प्रारंभ किया।इसी बीच 1971 में रायबरेली के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के जीत को उनके प्रतिद्वंद्वी राजनरायण ने उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। भारतीय राजनीति के इतिहास में इस मुक़दमे को इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण के नाम से जाना जाता है। 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री...या यूँ कहे कहे की भारतीय राजनीति की एक मात्र तानाशाह इंदिरा गांधी अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देेश में आपात्काल लागू कर लोकतंत्र की हत्या कर दी। 

इंदिरा के तानाशाही रवैये से देश के वैसे संगठन व राजनेता जो इंदिरा गांधी के पक्ष में थे ; उन्हे सत्ता का संरक्षण मिला तथा जो भी उनके विपक्ष में लोकतंत्र के साथ थे - यहाँ की जनता के पक्ष में थे उन संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और नेताओं को काल कोठरी मे बंद कर दिया गया। रातों रात प्रेस मीडिया पर प्री-सेंसर लगा कर प्रसिद्ध पत्रकारों को कैद कर दिया गया। न्याय तंत्र व प्रशासन बस मूक दर्शक बन कर रह गयी थी। आपातकाल का वह दौर जितना विभीषिका पूर्ण था उसका आज कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता है। 

1975 के आपातकाल के दौरान ना सिर्फ भारतीय जनता का मौलिक अधिकार छीना गया ; अपितु पहली बार विश्व के किसी देश के नागरिकों से बोलने , लिखने और जीने तक का अधिकार भी छीन लिया गया। ऐसा कहना था की आप इंदिरा के भारत में साँसे लेकर इंदिरा के विपक्ष में नहीं रह सकते हैं। राजनीति के विपक्ष में बोलने वालों की आवाज दबा दी गयी। परंतु भारत ने विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का प्रमाण एक बार पुनः दुहराया। 

एक तरफ जहाँ भारत के सत्ताधीश थे वहीं दूसरी तरफ भारत की जनता जय प्रकाश , अटल बिहारी वाजपेयी , लाल कृष्ण अडवाणी , मोरारजी देसाई , नानाजी देशमुख , कर्पूरी ठाकुर व अशोक मेहता जैसे धुरंधरों के साथ खड़े थे। समय था जब उस काले सच पर लाक्षागृह से संघर्ष की कहानी व बलिदानी रक्तों से संघर्ष की बुनियाद गढ़ी जा रही थी। देश ने एक ऐसा जन आंदोलन - छात्र आंदोलन देखा ; जिसकी परिकल्पना विश्व ने कभी नहीं किया था। भारत के प्रख्यात साहित्यकार जो अपने शब्दों के माध्यम से आंदोलन को जनता के बीच पहुंचा रहे थे ; उन्हें  नजरबंद किया गया। उस दौर में अपने अद्वितीय संघर्ष के कारण ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक प्रभावशाली सामाजिक संगठन के रूप में उभर कर आया ; जब संघ के सर संघचालक सहित सैकड़ो स्वयंसेवकों को जेल भेज कर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।  

हज़ारो बलिदान के पश्चात आंदोलन का परिणाम यह निकला की भारत के सबसे मगरूर शासक को यहाँ की जनता ने पटखनी दे दी। आज़ादी के बाद 1977 में पहली बार सर्वाधिक मतदान हुआ जिसका उद्देश्य था इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाना"सिंहासन खाली करो की जनता आती है" इस पंक्ति को सिद्ध किया यहाँ की प्रबुद्ध जनता ने। चुनाव आयोग ने इंदिरा गाँधी को अयोग्य घोषित कर के छः वर्ष तक प्रतिबंध लगा दिया। कांग्रेस को यह बात सदैव स्मरण में रखना चाहिए कि लोकतंत्र में तानाशाही का कोई स्थान नहीं है।

इस आपातकाल के संघर्ष के विषय में जितना कहा जाए कम होगा। एक ऐसा स्याह धब्बा जिसका दुर्गंध सदैव लोकतंत्र में नवचैतन्य का प्रवाह करता रहेगा। आज पुनः हम उन तमाम हुतात्माओं को स्मरण करते हैं जिन्होंने इस राष्ट्र धरोहर को बचाये रखा ; इसका लोकतंत्र जीवित रखा। हम उन सभी के बलिदान को नमन करते हैं। अपितु निश्चित ही यहाँ का लोकतंत्र खत्म करके राजशाही लागू कर भारत को पुनः कांग्रेस का गुलाम बना दिया जाता। 

आपातकाल के दौरान जेल में रहे बिहार में जन्मे महाकवि नागार्जुन ने अपनी एक कविता चिट्ठी में लिख कर इंदिरा गांधी के पास भेजा था.... 

"आपकी चाल - ढाल देख - देख लोग हैं दंग , 
हकूमती नशे का वाह - वाह कैसा चढ़ा रंग!! 
छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको ;
किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको!! 
समझ लिया आपने हत्या के पाप को
इन्दु जी , इन्दु जी! क्या हुआ आपको?
सत्ता मिलते ही - भूल गयी बाप को!!!"

8 टिप्‍पणियां:

nicodemos के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.