मतवाला (शृंगार रस) ~ काव्याराधी
सिमट अंगड़ाई आँचल मे जब,
चलती हो बलखाती सी बाला!
तपती भाव पर हया छोड़कर,
बोलो कौन ना होगा मतवाला?
गालों पर तेरे गंध कातिल सा,
ताखि तक लहराती रेशम बाल।
प्रचंड ज्वार है अधर पर तेरे,
मचलती यौवन रसमय शाम।।
स्पर्श है पल का चंदन जैसा,
ज्यों आलिंगन में सारे काम।
झुकी पलकों से स्वीकृत कर,
स्वप्न को दे दो अपने नाम।।
मद्य घटा में दीप्त सितारा कोई,
कमर के बाजू है तिल काला।
दुपट्टे पर छलकती धड़कन तेरी,
पायल कंगन खनके सुरबाला।।
रूप सुहावन चकोर सी प्रिये,
फितरत तेरी बहकी मधुशाला।
निहारत राखे दो टूक तुझको,
जो कौन ना होवे मतवाला।।

अति सुंदर ।
जवाब देंहटाएंBahut sundar
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
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