संस्मरण : चोरी का पुरस्कार
आपलोगों ने अक्सर सुना होगा की चोरी करने पर सज़ा मिलती है! पर कभी सुना है चोरी करने पर किसी को इनाम मिला हो?
"पिछले दिनों काफ़ी बीमार थी। घर की परेशानियाँ बढ़ रही थी। कुछ समझ नही आ रहा था हो क्या रहा है! लॉकडॉन के वजह से आर्थिक स्थिति तंग है ; स्नातक में नामांकन नहीं हो पा रहा..." इतना कहते कहते वो रोने लगी।
मैं अभी तक अंजान रहा की वो कौन है और मुझे ये सब क्यों बता रही है! परंतु जैसे वीराने मे अचानक से भुचाल आया हो...उसकी परेशानी ने मुझे संभलने के लिए एक पल का भी अवसर नहीं दिया। सहसा मुख से निकल पड़ा "मै आपकी हर संभव मदद करूँगा।"
इसके बाद कॉल कट गयी और मेसेज आया - "10,000 ₹ की आवश्यकता है मैं खुद लेने आऊँगी।" मैं काफी परेशान हो गया। मुझे उत्तर देने मे जल्दबाज़ी नही करनी चाहिए थी। आखिर दस हजार की रकम मामूली थोड़े न है! घर की आय भी सात हजार ही थी। शाम के तकरीबन 04 बज रहे थे ; मै भागा भागा घर पहुंचा और अपने सारे चिल्लर इक्कठा किया। सारे मिल कर 2000 भी नही हो पाए।
मैं काफी परेशान था। आखिर किसी की उम्मीद मुझ पर टिकी हुई थी। संयोगवश क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित नेता जी का (घर के बगल वाले मैदान मे) आगमन हुआ। चुनाव प्रचार का कार्यक्रम चल रहा था। उन्होंने भी लंबी चौरी भाषणबाज़ी की। छात्रों के बीच सक्रिय होने के कारण मेरी उनसे थोड़ी बहुत जान पहचान थी। मैं उनके पास गया और सारी बातें बताई। पर 2000 देकर उन्होंने ने भी हाथ खड़ा कर दिया। लेकिन यह भी काफी नहीं था। हमारे पास पांच हजार भी नही हो पाए थे।
कितना अज़ीब है न! एक अंजान व्यक्ति के लिए इतना परेशान होना! पर मेरे मन मे था शायद किसी की परेशानी को नज़रंदाज़ करने से हो सकता है उसकी परेशानी और बढ़ जाए! मैं यह कतई नही चाहता था की किसी की आँसू पे मेरे नाम का अक्षर भी चमके। मैंने अपने शुभचिंतकों से बात की और निकल पड़ा गाँव के लोगों से सहायता के लिए। थोड़ी ही देर मे मेरे पास 7327₹ हो गए थे। और पूर्ण सहयोग के बाद भी हम 8000 तक नहीं पहुँच पाए।
हमारा हौसला टूट चुका था। कोई उम्मीद भी नहीं बची थी।
"एक सख्स की मदद पुरा गाँव मिल कर नहीं कर पाया! कैसी विडंबना है ये? आखिर किस चीज़ की आधुनिकता है जो बच्चों के जज़्बातों की कद्र न कर पाएँ! लानत है ऐसे समाज..."
मन में यह दुर्भाव चल ही रहा था की अचानक से एक शराबी गिड़ता पड़ता हुआ आ रहा था। वो अपने होश में ना था। पास गए तो देखा ये तो मोहल्ले के खेलावन काका थे। हमें पहचानने के बाद जैसे वो निश्चिंत होकर सो गए हों , दुबारा उन्होंने उठने की कोशिश ही नहीं की।
इधर वो कॉल वाली मोहतरमा भी इंतज़ार कर रही थी। अचानक काका के जेब पर मेरी दृष्टि पड़ी। उसमें से कुछ रुपए बाहर निकले हुए थे। मैंने गिना उसमें 500 के पांच नोट थे। मैंने बिना कुछ सोचे समझे चार नोट निकाल कर अपना नंबर उनके जेब मे डाल दिया। अपने दोस्तों से कहा उन्हे घर पहुंचा दें और मैं पैसा लेकर निकल पड़ा।
तकरीबन शाम के साढ़े सात बज रहे थे। मैं उसका इंतज़ार करता रहा। कुछ देर मे वो लड़की भी आ गयी। जब सामने खड़ी उस लड़की को देखा तो मैं दंभ रह गया। सामने रुपाली खड़ी थी। वही खेलावन काका की भतीजी। थोड़ी बातचीत करने के बाद मैं उन्हें पैसा देकर लौट आया। मैंने उसे उसके चाचा के बारे मे कुछ नही बताया। उनके परिवार के बीच झड़प हो रखी थी। परंतु पैसा देने के बाद भी रातभर नींद नहीं आयी। आखिर मुझे चोरी करना पड़ा था! यह ग्लानि मुझे सताये जा रही थी। कहीं समाज मे बदनाम न हो जाऊँ...और वो! जो चाचा शराब पीकर पड़ा रहा और जवान भतीजी पैसों के लिए दूसरो के सामने गिड़गिड़ा रही है। तनिक भी लाज न रहा होगा उसे! आखिर इंसानियत भी कुछ होती है....
अगले ही सुबह हमलोग काका के यहाँ जाकर सारी बातें कहीं और कुछ प्रश्न किया!
चाचा कहने लगे - "हमारा बंटवारा हो चुका है ; हमारा उनसे कोई लेना देना नहीं। मुझे कोई फर्क नही पड़ता उनके साथ क्या हो रहा है! और तुम लफंगों ने जो चोरी की है उसकी रपट लिखवाउंगा सो अलग।"
हम सभी सहम गए। जिसका डर था वही हुआ। हमें लफंगा कहा जाने लगा। आँखो मे आँसू....
इतने में सरपंच काकी वहाँ से गुज़री। उनके साथ गाँव के चार बुजुर्ग भी थे। उन्होंने पूरा मामला सुनने के बाद खेलावन काका को फटकार लगायी। और कहा - चोरी करना गलत है ; इसकी सज़ा हर किसी को मिलनी चाहिए। चाहे वो अमीर हो/गरीब हो/नेता हो या छात्र हो! परंतु तुमलोगों ने जो भी किया वो परहित के लिए किया। इसलिए इस बार सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है।
"और साथ ही आने वाले गणतंत्र दिवस पर आयोजित समारोह में छात्रों के पैसे ससम्मान वापस किये जायेंगे।"
उसके बाद वहाँ से निकल कर सुकून की सांस ली। मन में एक खुशी थी। आखिर चोरी से ही सही लेकिन एक नेक काम तो किया।
जो चीज़ अनावश्यक कहीं पड़ी हो उसे उठा कर उसका सदुपयोग करना चोरी नहीं है। ~ स्वामी दयानंद सरस्वती

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