गज़ल : चांद की खुशबू (प्रेमकाव्य)
मेरे आंगन से चाँद चुरा ले गए हो संभाल पाओगे क्या?
जो हम ना निभा सके कभी! तुम निभा पाओगे क्या?
जिस इत्र को लेकर इतरा रहे हो...
महकती थी वो मेरे कपड़ो पे कभी..
तुम उसकी खुशबू से मेरा नाम मिटा पाओगे क्या ?
तुम उसकी खुशबू से मेरा नाम मिटा पाओगे क्या ?
जिद और इश्क़ की डोर कोई बांधे तो कैसे?
नामंजूर है जो दस्तरस् को उसे साधे तो कैसे?
मेरे हर लफ्ज मे बिखड़ी है सूरत उसकी...
मेरे इबादत की थाल है सीरत उसकी...
ख्वाबों पे तुम पहरेदार लगा भी दो चाहे!
उसके सिंदूर पर केसर तुम चढ़ा पाओगे क्या?
ख्वाबों पे तुम पहरेदार लगा भी दो चाहे!
उसके सिंदूर पर केसर तुम चढ़ा पाओगे क्या?
उसकी खुशबु से मेरा नाम मिटा पाओगे क्या?
मंज़र से खेलते हो तो तपने की हिमाकत् करो।
लड़ो तख्तों से पर खुद की भी हीफाज़त करो।।
ये नग़मा - ये शेर जुमले - कहावती हैं ठीक है ;तिलसिम को ज्वार मे रखो खिलाफत करो...!!
जंग नहीं! इश्क़ की बगावत का पन्ना है ये ;
इस पन्ने से अपनी कलम हटा पाओगे क्या?
अपनी खुशबू से मेरा नाम मिटा पाओगे क्या?
चंद रस्मों रीवाज से तुम उसे पाने चले हो?
मैं उसके यादों में हूँ वो मेरी नस नस में है!
अश्क आँखों से बहाकर बारात सजाया है
वो इठलाती हुई अधूरी सी मेरे जीवन में है!
आधे पन्ने पर कोई नगमा गुनगुना पाओगे क्या?
उसकी खुशबू से मेरा नाम मिटा पाओगे क्या?
© काव्याराधी ✍

My my my my my god
जवाब देंहटाएंThanks 💕
हटाएंAtiuttam
जवाब देंहटाएंधन्यवाद भाई 🙏🏻😊❤
हटाएंShaandar Jabardast Jindabad
जवाब देंहटाएंधन्यवाद ❤
हटाएंWow super 👍👍
हटाएंधन्यवाद ❤
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