लघु काव्य रचना : अयोध्या मंदिर निर्माण
प्रातः की उत्सुक यह अरुणिम बेला ,
बढ़ती पथ पर संस्कृति की पावन मेला।
निष्कलंक थी भूमि जहाँ पर हुई यह चोट ,
पापी के भीतर थे पल रहे लालच के खोट।।
बढ़ती पथ पर संस्कृति की पावन मेला।
निष्कलंक थी भूमि जहाँ पर हुई यह चोट ,
पापी के भीतर थे पल रहे लालच के खोट।।
दिया निर्णय सर्वोच्च ने उस पावन धाम की ,
मर्यादा के प्रतीक जो मंदिर बनेगी श्री राम की।
लालच नहीं टिकता देर सत्य के आगे हे वीर ,
चंदन करने स्वयं पहुंचे अयोध्या आज रघुवीर।।
जीत नहीं यह धर्म विशेष की नाही किसी की हार ,
संघ तपस्या के निर्णय को सहर्ष करें स्वीकार।
प्रजा खुश है , राजा खुश हर तरफ खुशहाली है ,
झूमें - नाचें , खुशी मनायें आयी फिर दिवाली है।।
बाकी कहानी बहुत अभी पूज्य हरी के नाम की ,
जय बोलो , जय बोलो , जय बोलो श्री राम की।
करें बिहारी भगवा तिलक लेकर ये अनुधान ,
करो तैरायी जोरो से होगा अब मंदिर निर्माण।।
जय बोलो , जय बोलो , जय बोलो श्री राम की।
करें बिहारी भगवा तिलक लेकर ये अनुधान ,
करो तैरायी जोरो से होगा अब मंदिर निर्माण।।

उत्कृष्ट लेखन💐💐
जवाब देंहटाएंबेजोर...
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