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तुम खड़ी हुई उस पार प्रिये...



नदियाँ मजबूरी की बहती ,
हमदोनों के दो धार प्रिये।
मैं इस तट पर बैठा गुमसुम सा ,
तुम खङी हुई उस पार प्रिये।।

मै शाखों से टूटा एक पत्ता ,
तुम पल्लव का आधार प्रिये।
मैं धूल में दफन परिंदा हूँ ,
तेरे सम्मुख आकाश प्रिये।।

मैं मरुभूमि सा बंज़र हूँ ,
तुम गंगा का मैदान प्रिये।
मैं जल से सदा अछुता हूँ ,
तुम तो नदियों का प्यार प्रिये।।

तुम समृद्ध महल कुमारी हो ,
मुझे कुटी का उत्तराधिकार प्रिये।
मैं तो कष्टों का वारिस हूँ ,
तुम खुशियों का संसार प्रिये।।

तनु दिल की लालस अधिक ,
चाहों में छुपा लूं चाह प्रिये।
मैं वंचित आरक्षित सूरत से ,
तुम रूूपसी की छाँव प्रिये।।

मैं झील किनारे पत्थर फेंकता ,
करता तुझसे फरियाद प्रिये।
कुछ और नहीं लालस मन में ,
मुझे चाहिए तुम्हारा साथ प्रिये।। 

सुनो! त्याग प्रेम की मूरत है ,
परित्याग प्रेम का धाम प्रिये।
तुम स्वामिनी हो उन भावों की ;
जिन्हें पूजता मैं हर द्वार प्रिये।।

                          © काव्याराधी ✍
Special Thanks to Prabhat Singh Rana.

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