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बड़ी दुर्गा मंदिर, प्रतिमा विसर्जन, समस्तीपुर


आज आपको लेकर चलते हैं समस्तीपुर में अवस्थित बड़ी दुर्गा मंदिर की ओर।

आज से लगभग सत्तर वर्ष पूर्व इस मंदिर की स्थापना हुई थी। कहा जाता है दरभंगा के महराजा स्व. कामेश्वर सिंह जी के सौजन्य से पूजा अर्चना हेतु इस मंदिर की स्थापना हुई थी। शहर के बड़ी दुर्गा स्थान चौक (रोसड़ा) पर स्थापित बड़ी मैया की प्रसिद्धि व महानता इतनी ज्यादा है कि श्रद्धालु जबतक यहां दर्शन न करें उन्हें अपनी पूजा अधूरी लगती है।

दरभंगा महाराज के द्वारा रोसड़ा में स्थापित यह स्थान , इस क्षेत्र में माता की सबसे पुरानी मंदिर है। जिसे लोग पुरानी दुर्गा मंदिर के नाम से भी जानते है। यहां के पूजन पद्धति को लेकर कई प्रकार की मान्यताएं हैं जो इसकी महिमा को और प्रभावित करती है।


स मंदिर में आज भी वैष्णव पद्धति से ही माता की पूजा - अर्चना की जाती है। चैती दुर्गा पूजा हो या आश्विन मास में आयोजित दुर्गा पूजा ; दोनों ही अवसर पर लोगों की एक जैसी भीड़ उमड़ती है। 


स्थानीय लोगों की माने तो कई जमींदारो ने इस मंदिर के इमारत को भव्यता देने का प्रयास किया ; परंतु प्रयास स्थापित हो ही नहीं पाया। कहा जाता है मंदिर के समीप जब भी नयी दीवार खड़ी की जाती है , वह स्वतः ही टूट जाता है। एक प्रमाणिक मान्यता यह भी है कि यदि नव दिन के पूजा पद्धति में किसी प्रकार की त्रुटि होती है तो दसवें दिन अथक प्रयास के उपरांत भी माता की प्रतिमा जमीन नहीं छोड़ती।


कुछ वर्षों पहले किसी अनुयायी से नवरात्र के दौरान कोई त्रुटि हो गयी थी! और दशमी के दिन जैसे ही भूलवश उन्होंने ने प्रतिमा को हाथ लगाया प्रतिमा अग्नि से जलने लगी। लोग उसे जितना बुझाने का प्रयास करते आग की लपट उतनी ही तेज होती जाती। ततोपरांत पुजारी द्वारा क्षमा यज्ञ किये जाने पर पुर्नावृति रूप से अग्नि की लपट शांत होने लगी।


》》यहाँ के भक्ति भाव का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि विसर्जन के समय जब तक यहाँ की प्रतिमा न उठ जाए ; शहर की कोई मुर्ति नहीं उठती है। यहां के प्रतिमा (230 kg+) को लोग अपने कंधे पर उठाकर नगर भ्रमण (06-07 km) करवाते हुए नदी तक ले जाते हैं। विसर्जन के दौरान बड़ी मैया के प्रतिमा के पीछे पीछे ही शहर की सारी प्रतिमाएं जाती है। लगभग दस हजार लोगों के साथ गुजरती हुई इस जुलूस में लगातार चार घंटो के जयकारा व करतल ध्वनि से वातावरण गुंज्यमान हो जाता है ; जिसकी शोभा देखते ही बनती है।


एक मान्यता यह भी है की विसर्जन के दौरान कंधे पर स्थित माँ (प्रतिमा) के चरणों को छू लेना सबसे बड़ी सौभाग्य की बात होती है। माँ भगवती के असीम कृपा से इस वर्ष मैं भी हर उस परम-भाग्य का भागी बना जिसके लिए बड़ी मैया प्रसिद्ध है।


2 टिप्‍पणियां:

  1. जय हो मातारानी प्रार्थना है उनसे की कभी हमलोगों को भी ये सौभाग्य प्राप्त हो।

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