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प्रेमकाव्य 1 - मौसम का संदेश

 


शीर्षक : मौसम का संदेश (प्रेमकाव्य1)


प्रीत प्रेम के भटकन में धागा सी
अचनाक से कुछ चटक गयी हो ,
तेरी मिठे ख्यालो मे इतना उलझे
मेरी सांसों में तुम अटक गयी हो।

तेरी सादगी से अब प्रेम कर हम
बारिश की गिरती बुंद संजोकर ;
बूँदों को जब जिह्वा पर रखते -
वर्षों से मेरी प्यास पर आघात...
उसकी हल्की सी मिठास जैसे ,
तुम्हारी पहली चुम्बन की यादों में 
मेरे तन को तह तक झंकारती है।।
और बताओ यह मौसम तुझसे
मेरे बारे में क्या कहती है ?

पतझड़ से पत्ते भरे आंगन में 
विचरण में कुछ तो इंगित करती ;
भरा मेरा मन यूँ ही खालीपन से
पल पल प्रतिक्षा में तेरी जो रहती।
एकांत चिंतन में कोई मुग्ध - सा
सहसा दिखे पड़ता है मुझको...
जैसे चिड़ियों की कूहक भोर में
चित के सबर संगीत पुकारती है ;
और बताओ यह मौसम तुझसे
मेरे बारे में क्या कहती है ?

माटी के कण को अभिलाषा से
अक्सर खेलता हूँ इसे प्रेम कर...
प्रिये तेरी आकृति बनाता हूँ ;
उसको अपनी प्रेयसी मान अब
कभी सहलाता कभी रूठ जाता हूँ।
कान्हा बनने की चाहत से बेखबर
अब यह प्रेम तुझे चित्कारती है...
और बताओ यह मौसम तुझसे 
मेरे बारे में क्या कहती है ?

जाने ये तुझसे क्या कहती होगी
हास्य रूदन या प्रेम सिमट गयी हो!!
पर मुझसे ये ही कहती अक्सर...
मेरी सांसों में तुम अटक गयी हो॥

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