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भारतीय राजनीति के ब्रांड एंबेसडर — प्रशांत किशोर

 

भारतीय राजनीति और प्रशांत किशोर

जैसे जैसे बिहार चुनाव नजदीक आता जा रहा है, राजनीति और पेंचीदा होती जा रही है। विषेशज्ञों की मानें तो इस बार का बिहार चुनाव काफी रोमांचक और निर्णायक होने जा रहा है। रोमांचक इसलिए क्योंकि इस बार प्रशांत किशोर की जन सुराज भी मैदान में है, और निर्णायक इसलिए की इस वर्ष का चुनाव परिणाम आगामी दो दशक की राजनीतिक दिशा और दशा तय करेगी। भले ही NDA के अंधभक्त प्रशांत किशोर को बिहार का केजरीवाल कहें या UPA के चमचे प्रशांत किशोर को बीजेपी का एजेंट कहें, लेकिन सत्य तो यह है कि जो कार्य प्रशांत किशोर ने बीते ढाई साल में किया है, उसने बिहार की जनता को एक नई उम्मीद दी है।

प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और प्रभावशाली रणनीतिकार रहे हैं। उन्होंने राजनीति में चुनावी रणनीति को एक नई दिशा दी है, जहां डेटा, ग्राउंड लेवल फीडबैक और सटीक मैसेजिंग को प्राथमिकता दी जाती है। अपने कार्यों और उपलब्धियों के चलते वे ‘पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट’ के रूप में भारतीय राजनीति के एक 'ब्रांड' बन चुके हैं। उन्होंने इंजीनियरिंग और पब्लिक हेल्थ में शिक्षा प्राप्त करने के बाद कई वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र (UN) के लिए पब्लिक हेल्थ प्रोजेक्ट्स पर कार्य भी किया है।

UN में अपनी सेवा देने के बाद प्रशांत किशोर भारत वापस आएं और यहां उन्होंने Indian Political Action Committee (I-PAC) की स्थापना की, जो चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने वाली भारत की पहली संगठित संस्था है। यह संस्था जमीनी कार्य, सर्वे, डेटा विश्लेषण, और प्रचार रणनीति के जरिए नेताओं और दलों को चुनावी जीत दिलाने में मदद करती है। I-PAC के जरिए प्रशांत ने हजारों युवाओं को रोजगार भी दिया।

प्रशांत किशोर का राजनीतिक रणनीति का सफर 2011-12 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शुरू हुआ। उन्होंने Citizens for Accountable Governance (CAG) नाम की एक संस्था के माध्यम से 2014 के आम चुनाव में BJP की जीत के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसी टैगलाइन और चुनाव प्रचार की डिजिटली रणनीति ने उन्हें रातोरात सुर्खियों में ला दिया।

नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार करने के अलावा भी प्रशांत किशोर ने कई प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए काम किया और उन्हें ऐतिहासिक जीत दिलाई। इनमें शामिल हैं:

  • 2012 - भारतीय जनता पार्टी (गुजरात) – नरेंद्र मोदी 
  • 2014 – भारतीय जनता पार्टी – नरेंद्र मोदी (केंद्र)
  • 2015 – जनता दल (यूनाइटेड) – नीतीश कुमार (बिहार)
  • 2017 – कांग्रेस (पंजाब) – अमरिंदर सिंह
  • 2019 – वाईएसआर कांग्रेस (आंध्र प्रदेश) – जगन मोहन
  • 2021 – तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल) – ममता बनर्जी
  • 2021 – डीएमके (तमिलनाडु) – एमके स्टालिन

हर राज्य में अलग रणनीति, स्थानीय मुद्दों और नेताओं की छवि को सामने रखकर प्रशांत किशोर ने चुनावी राजनीति को वैज्ञानिक और पेशेवर दृष्टिकोण से बदलने का प्रयास किया और अपनी मेहनत से अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को प्रचंड जीत दिलाने में अहम भूमिका भी निभाई। हाशिए पर पड़े राजद को भी तेजस्वी के नेतृत्व में 2015 में बिहार जीताने में प्रशांत किशोर की अहम भूमिका रही।

प्रशांत किशोर की एंट्री

प्रशांत किशोर ने पहली बार 2015 में बिहार की राजनीति में चुनावी रणनीतिकार के रूप में प्रवेश किया। उन्होंने उस समय नीतीश कुमार के लिए चुनावी रणनीति बनाई थी और महागठबंधन (राजद–जदयू–कांग्रेस) को जबरदस्त जीत दिलाई थी। 2015 के चुनाव में प्रशांत किशोर की डेटा आधारित प्रचार रणनीति, 'हर घर दस्तक' जैसे अभियानों और 'युवाओं के साथ संवाद' ने नीतीश कुमार की छवि को मजबूत किया, जिससे उन्हें बंपर जीत मिली।

उनकी सफलता को देखते हुए, नीतीश कुमार ने उन्हें अपना विशेष सलाहकार भी बनाया। लेकिन यह संबंध ज्यादा लंबा नहीं चला और प्रशांत किशोर ने कुछ ही समय में जदयू से नाता तोड़ लिया, विशेष रूप से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर पार्टी के रुख को, मतभेद का कारण बताया गया।

2021 में तृणमूल कांग्रेस और DMK को जीत दिलाने के बाद ही प्रशांत किशोर ने संकेत दे दिए थे कि वे अब केवल रणनीतिकार नहीं रहना चाहते हैं, बल्कि सक्रिय राजनीति में भाग लेकर जन्मभूमि के लिए कुछ करना चाहते हैं। इसके बाद ही उन्होंने 2022 में बिहार के अंदर 'जन सुराज' नामक अभियान शुरू किया जिसका उद्देश्य एक "नई राजनीतिक संस्कृति" की स्थापना करना है। इस पहल के माध्यम से वे बिहार की जनता से सीधे जुड़ रहे हैं और राज्य की राजनीति को नए ढंग से गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

देखा जाए तो यह अभियान बिहार में दशकों बाद एक गैर-परंपरागत और ज़मीनी स्तर की राजनीतिक यात्रा है, जिसका मूल उद्देश्य है:

  • बिहार की राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक सुधार करना
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान केंद्रित करना
  • जातिवादी राजनीति की जगह मुद्दा आधारित राजनीति की शुरुआत करना

इन दिनों बिहार के जिस भी गांव में जन सुराज की पदयात्रा पहुंच रही है, वहां पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की बातें कही जा रही है। बीते कई दशकों से बिहार विकास के दृष्टिकोण से उपेक्षित रही है। श्री बाबू को हटा दें तो बिहार को किसी भी अन्य सरकार में उतनी तरक्की नहीं मिली जितना का यह हकदार है। ऐसे में प्रशांत किशोर बिहार के एकमात्र राजनेता हैं जो विकास और प्रगति की रोडमैप लेकर राजनीति करने चले हैं। प्रशांत किशोर दावा करते हैं कि जन सुराजी सरकार बनाने का मतलब है जनता का सुंदर राज लाना। जन सुराज सरकार में आते ही, स्थानीय स्तर पर युवाओं को रोजगार देने, विश्वस्तरीय शिक्षा प्रणाली मुहैय्या कराने, बिहार को अग्रणी राज्यों में शामिल कराने, महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वाबलंबी बनाने, पलायन पर रोक, आधुनिक सरकारी चिकित्सा व्यवस्था तथा भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते हुए, पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रही है। इसके साथ ही जनता से यह भी अपील कर रही है कि हम अपने विधानसभा क्षेत्र में पार्टियों से ऊपर उठ कर, अच्छे प्रतिनिधि को चुने। यहां आदर्शवादी राजनीति का पर्याय भी जन सुराज बनना चाह रही है

गौरतलब है कि बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय दलों और करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं ने दशकों तक यहां की राजनीति को दिशा दी है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में प्रशांत किशोर ने अपने प्रयास से न केवल बिहार की राजनीतिक रणनीति को चुनौती दी, बल्कि अपनी "जन सुराज यात्रा" के जरिए एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रतिस्थापित भी किया है।

90 के दशक के बाद की बात करें तो बिहार की राजनीति ऐतिहासिक रूप से मंडल-कमंडल के विमर्श, सामाजिक न्याय, और पिछड़ों-दलितों व MY के गठजोड़ों पर आधारित रही है। यहां की राजनीति में जातीय आधार पर वोट बैंक का प्रभाव हमेशा से महत्त्वपूर्ण रहा है। जहां लालू प्रसाद यादव की पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भर रही है, वहीं नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने विकास और सुशासन के नाम पर राजनीति की नींव रखीं। 80 के दशक में जेपी आंदोलन के बाद कांग्रेस बिहार में दुबारा खड़ा न हो पाया। राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त लेकिन बिहार में जातीय संतुलन बनाकर चलती है।

भविष्य की संभावना

नई राजनीति के प्रयास में प्रशांत किशोर 3 वर्षों से अपनी पदयात्रा के माध्यम से गांव–गांव जाकर जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं और जनता से वादा कर रहे हैं कि वे "जनता की राय के आधार पर" एक नई राजनीतिक व्यवस्था बनाएंगे। जहां एक ओर बिहार में हर दल के नेता जाति–धर्म और आरोप–प्रत्यारोप की राजनीति में लगे हैं, वहीं प्रशांत किशोर गांव–गांव जाकर लोगों को सामाजिक मुद्दों पर सवाल करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

प्रशांत किशोर बिहार में एक "तीसरा विकल्प" बनने का दावा करते हैं, जहां वे ना तो सत्ताधारी गठबंधन से जुड़ना चाहते हैं, ना ही राजद की परंपरा को अपनाना चाहते हैं। उनके पास युवाओं की एक बड़ी टीम, एक स्पष्ट विज़न और रणनीतिक कौशल है। जन सुराज पद यात्रा के लिए प्रशांत किशोर की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। किंतु, क्या ये प्रशंसा वोट में तब्दील होगी? यह प्रश्न प्रशांत को भी परेशान करता होगा। क्योंकि बिहार जैसे राज्य में जहां राजनीति जाति, परंपरा, बाहुबल और परिवारवाद की गहराई से जुड़ा हुआ है, वहां केवल विचारधारा और संगठनात्मक कौशल से जीत हासिल करना जन सुराज के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। 

हालांकि! प्रशांत किशोर एक ऐसा नाम जरूर बन चुके हैं, जिसने भारतीय राजनीति में बैकएंड रणनीति को फ्रंटलाइन में ला खड़ा किया है। उनका योगदान यह साबित करता है कि चुनाव केवल जनसभाओं और भाषणों से नहीं, बल्कि सूक्ष्म रणनीति, डेटा एनालिसिस और ग्राउंड कनेक्शन से भी जीते जा सकते हैं। वे एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत में चुनाव प्रचार की दिशा ही बदल दी है। बिहार में यदि वे जनता को जागरूक करने में सक्षम रहते हैं और जनता इन पर विश्वास दिखाती है, जाति-धर्म से ऊपर उठकर राज्य के विकास के लिए मतदान करती है, तो प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में निश्चित रूप से एक नई लकीर खींच सकते हैं।

© रोहित कु. ठाकुर (गायघाट, मुजफ्फरपुर)

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