कवनो पूछत रहलें हऽ कि छठ का होखेला?? 😊
काहे की ई समय होला छठ पूजा के.. 😍
एगो बिहारी "बिहार" बुझे से पहिले "छठ" बुझ जाला.. माने एगो अइसन परब, जवना में भर बिहार के घर से छठ माई के गीत संग ठेकुआ के खुशबु आ तिवैया के पियरी से पुरा बिहार आनंदित हो उठेला... ❤
बिहार के मान सम्मान, मर्यादा पहचान, सांस्कृतिक उत्थान, आउर लोकआस्था के चार दिवसीय गौरवशाली महापर्व हवऽ छठ। एह परब में वरतिया अपन समाज के कल्याण आउर परिवार के समृद्धि कऽ लेल 48 घंटा के निर्जल उपवास करऽलन आ भगवान दीनानाथ (सूर्य) के दु बेर अरघ देवऽलन।
हमनी के जीवन में छठ परब के महत्व कवनो इहे बात से समझ सकऽलस की छठ पूजा के एक एक विधि हमनी के साँस में बसल बा।
"नहाय खाय" के कद्दुआ भात से शुरू होवे वाला ई परब खरना के नयका धान से कुटाएल चाउर आ मिट्ठा वाला खीर से आगे बढ़ेला। खरना के सांझ रौणा माई के पूजा होखे बेर केरा (केला) के पात पर न्योज कढ़ा ला। बूढ़ पुरान लोग कहेलें जे "खरना पूजा" के दिन उहे पात पर छठ मईया के नेवता भेजल जाला।
खरना के बाद संझकार्घ के भोरवा में घरे घरे ठेकुआ छनाएल शुरू हो जाला, जवना के खुशबु से मन विभोर हो उठेला। आ ओहि समय नयका लईका सब में नदी तीरे जाके घाट छेके के होड़ होखेला। सब भाई अपन अपन घाट छेकला के बाद एक दूसर के घाट बनावे में परस्पर सहयोग भी करे ले। संझकार्घ के सांझ (शाम) होखते सब तिवई अपन बहँगी, ऊखी आ डाला लेके पहुँच जाले घाट पर.. आउर इहां से शुरू हो जाला महापर्व के दिव्य स्वरूप!!!!!
संझकारघ में नदी के बीच ठाड़ (खड़ा) होके अस्तांचल सूर्य के अरघ दिहल जाला.. ई परंपरा समाज के हइ संदेश दिवल चाहेले की समाज में जेकर पतन होता, ओकर सम्मान कैल भी आवश्यक बा। जीवन में कबो भी कोई ढलान आवे त चिंता छोड़के, अस्थिर से ऊ समय के सम्मान करल चाही.. काहे की जेकर अस्त होला ओकर उदय भी निश्चित बा।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष सप्तमी के होखेला पारण.. महापर्व के सबसे दिव्य दिन, अंतिम स्वरूप। गाँव देहात के लोग एकरा भोरकार्घ भी कहेलन। एह दिन तिवई फजीरे से नदी के शीतल जल में चार घंटा ठाड़ होकऽ उद्यांचल सूर्य के अरघ देवऽले। एकर माने केहु भी आदमी, केतनो भी मुसीबत में काहे ना होखे.. बाकी एक दिन ओकर भाग्य के सूरज जरूर उगीहें आ ओकर जीवन में नया प्रकाश लइहें।
"भोरकार्घ के फजीरे जब तिवई के दियउरी के अंजोर से असमान जगमगा जाला, नदीया के पानी चमके लागेला, आ काकी - महतारी छठ पूजा के सुनर लोकगीत गावेलिन, तब ई परब आऊर सोहावन हो जाला। निःसंदेह भोरकार्घ के बेला में जे केहु भी अंजान आदमी छठ घाट पर पहुँच जाई ! त ओकरा बिहार से, बिहारी से आ छठ पूजा से प्रेम जरूर हो जाई।"
छठ घाठ पर दउरा उठावत बेर एक दूसर के परस्पर सहयोग हमनी के एकता आ ठेकुआ मांग के खाइल हमनी के सामाजिक अधिकार आ प्रेम के एक सूत्र में बांध देवेले।
वर्षांत से हमनी ईहे परंपरा के निभावत आ रहल बानी। छठ व्रत के वरतिया तीन दिन के निर्जल उपवास रखेनी आउर आठ - नौ घंटा पानी में ठाड़ होकऽ सूर्य देव के उपासना कऽरेलिन। ई देखक हमनी में परब के प्रति श्रद्धा स्वत: बढ़ जाला। आउरों ऐसन बहुत विधि बा जे छठ पूजा के प्रतिष्ठा की ओर लोगवन के आकर्षित करेला। छठ पूजा के महत्व केवल एक बिहारी ही समझ सकेला, वास्तव में इह केवल परब नईखे बल्कि हमनी के गौरव भावना बा।
॥जय छठ मइया॥






बहुत बढ़िया👌🚩🕉️
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद.. 🙏🏻
हटाएं🙏जय छठी मईया🙏
जवाब देंहटाएंजय छठी मईया.. 🙏🏻
हटाएंलिखे के मतलब खाली शब्द भर के एक लंबा लेख बना देवे का उद्देश्य ना होला, राउआ इ बात के साबित भी क देहनी ह।
जवाब देंहटाएंराउर ई लेख के एक एक शब्द हमनी के बिहारी होखे पर गर्व महसूस करैनी ह। रऊआ सही कहनी ह की छठ खाली (सिर्फ) एक पर्व कहे तक सीमित ना बा।
छठी मैया से प्रार्थना करऽ करऽ तानी की रउआ पर आइसे ही कृपा बनाए रखी, औरो ऐसे ही अपना ऐतिहासिक परंपरा के विस्तार से हमनी लोगिन तक पहुचाबत रही। 😊
बहुत बहुत आभार भाई.. 🙏🏻 राउर टिप्पणी बहुत नीक लागल। ईहे प्रेम बनवले रहीं.. बाकी जय छठी मईया.. 🥳❤
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